गुरुवार, 18 अगस्त 2016

राखी के साइड इफेक्ट

उन दिनों रक्षाबंधन का त्योहार हमारे जैसे कुछ लड़कों के लिए किसी आतंक से कम नहीं हुआ करता था। राखी का नाम सुनते ही उनके चेहरे का रंग फीका पड़ जाता। राखी लेकर बढ़ती लड़कियाँ जो साल के बाकी दिन ऐश्वर्या और दीपिका दिखतीं थीं आज गेटअप बदलकर पुराने फिल्मों की टुनटुन बनी जाती थीं। लड़कियों के आगे कलाइयाँ बढ़ाते उनकी निरीह आँखें जिबह होने जा रहे बकरों से उधार ली हुईं लगती थीं। राखी उनके कोमल अरमानों की बल्ब का फ्युज़ उड़ा जातीं और कुंवारे जीवन की शाम तेजी से ढ़लती हुई अंधेरी रात बन कर रह जाती। जाने कितने लड़कों का अरमान राखी के धागे से लटककर दम तोड़ देते थे।

 फ़र्ज कीजिए कि आप ने मन-ही-मन किसी को मन में बसा रखा हो। पूरे शिद्दत से आप इंतजार कर रहे हो उस दिन का जब आप अपनी हिम्मत बटोरकर उसके सामने अपने प्यार का इज़हार कर सके। पर बीच में ही रक्षाबंधन नामक वह दिन आ जाए और सामनेवाली की राखी आपकी कलाइयों पर ‘चींटियाँ कलाईयाँ’ करते हुए बंध जाए…. एक ऐसे ही बेचारे दोस्त की करूणापूर्ण कहानी मुझे याद आ रही है जब उसकी उमंगों की डोली राखी के धागे से लटककर उलट गयी थी…

... अपनी उमर में कॉलेज के वैसे लड़के किसी स्वतंत्रता सेनानी से कम नहीं होते जो किसी एक लड़की पर कॉन्सेन्ट्रेट करके बाक़ी लड़कियों की तरफ देखना भी गुनाह समझे।फिर कॉलेज जाने का इतना बड़ा ऑफर मिस करने का साहस कोई बिरले ही करते हैं। आख़िर सिर्फ एक लड़की के लिए शहीद होने के लिए जिगरा भी तो चाहिए। प्रियांश भी उसी नस्ल का लड़का था। न जाने कौन-से कीड़े की डंक का असर था कि अमिता नाम के अक्षरों के अलावा कुछ पहचान ही नहीं पाता था। पता नहीं उसे क्या – क्या अच्छा लगता। अमिता की ऑखें… अमिता की जुल्फें… अमिता की चाल….अमिता का चेहरा… अमिता की अदा… वह जब तक अमिता की ज्यूग्राफी खत्म कर रहा होता, उतनी देर में लड़कियों की पूरी दुनिया हमारे सामने से गुजर जाती। वैसे भी हमें तो हमारे पास से गुजरती हर लड़की अच्छी ही लगती, बिना भेदभाव के सब पर निगाह चली जाती थी। कॉलेज की भारी-भरकम फ़ीस वसूल करना है, यह बात भी अच्छी तरह से याद रहती।

ख़ैर, प्यार के शहीदों की दुनिया ही अलग होती है। अमिता नाम की माला जपते प्रियांश दूसरी लड़कियों की तरफ़ देखना भी गंवारा नहीं करता। लड़कियाँ भी तिरछी नजरों से उसी की तरफ़ देखते हुए निकलती। शायद उसकी तरफ़ से ख़तरा नहीं था, यह भाँप गयी थीं। क्योंकि, सुंदर तो हम भी कुछ कम न थे, अपने तरीके से ऋतिक रोशन बने फिरते थे लेकिन साले की बात ही कुछ और थी। वह कॉलेज की पहली पीरियड मिस कर सकता था लेकिन अमिता का आना – जाना कदापि नहीं। अमिता भी निकलते हुए एक – आधी नजर देख लेती, प्रियांश का दिन बन जाता। चार महीने में बात सिर्फ इतनी ही बढ़ी थी उनकी। नाम भी हमारा ही दिया हुआ था – ‘अमिता’। 

इस बीच हमारी दोस्ती सात-आठ से हो चुकी थी और उनमें से आधी के साथ सिनेमा, घूमना-फिरना भी हो चुका था। यह अलग बात है कि इस चक्कर में महीने के बीस दिन हम कंगाल से बने फिरते थे। इस दरम्यान हमारी सारी रहीसी Pause Mode पर शिफ्ट हो जाती। महँगे सिगरेट की जगह पनामा और जरूरत होने पर बीड़ी से भी नाता जोड़ लेते,  Movie देखने की आदत वही होती (First Day – First show वाली), बस बैठने की जगह बदल जाती- BC /DC से रियर स्टॉल। यह सब Adjustment सिर्फ लड़कों के ग्रुप में होती, लड़कियों के साथ होने से फिर से ब्रांडेड रहीसी वापस चढ़ जाती थी जिसकी फंडिग दोस्तों से लिए गए उधार से होती थी। दोस्तों की यह क्रेडिट-सेवा सिर्फ ऐसे मौकों के लिए ही उपलब्ध थीं।

ऐसा नहीं था कि हमने प्रियांश को अपनी ग्रुप में लाने के लिए कोई कम मेहनत की। पर पता नहीं कौन सा भेजा लेकर पैदा हुआ था कि हमारी सारी खूबियों में कोई न कोई कमी निकाल देता। सिगरेट को नशा कहकर टाल देता, बीयर को कड़वी समझकर और सिनेमा को टाइमपास बताकर। अब किस्मत कौन बदल सकता है! जो लिखा है वही भोगता न।
देखते-देखते वह दिन भी आ गया जिसका इंतज़ार हर भाई-बहन को तो होता है पर किसी लड़के को नहीं। इस दिन बिना कंफर्म रिश्ते वाले जोड़े छुट्टी लेकर अलग रहना ही उचित समझते हैं। लड़के तो विशेष सतर्कता बरतते हैं इस दिन। पता नहीं काली बिल्ली के जैसी कौन-सी लड़की मिल जाए राखी लिए और एक रिश्ता फ्रेंडशिप से प्रेम- शिप बनने के पहले ही दूसरी राह मुड़ जाए! खैर, हमने तो पहले ही आपस में एक-दूसरे की बहन होने का फ़र्ज निभा लिया। अब सूनी कलाई लेकर बाहर निकलने में रिस्क कितना होता है यह तो आपलोग जानते ही हैं। पर इत्ती-सी बात प्रियांश को समझ नहीं आयी। अमिता को देखने की ललक में रिस्क – फैक्टर ही भूल गया। रक्षाबंधन के दिन सूने हाथ दूर से ही चमकने लगते हैं और न देखने वाले भी एक बार देख लेते हैं जिज्ञासावश। छूट्टी का दिन था। लड़कियाँ झुंड के झुंड घूम रहीं थीं अपने-अपने हॉस्टल से निकलकर। उनमें से कुछ आकर खड़ी हो गईं प्रियांश के सर पर। आनेवाले ख़तरे से अनजान वह टकटकी लगाए हुए था अमिता के हॉस्टल की तरफ से आनेवाले रास्ते पर। उनमें से एक ने उसका ध्यान खींचने के लिए कहा – “भैया….!  लगता है आपके लिए राखी नहीं आयी है।“ प्रियांश इस अचानक हुए हमले के लिए कतई तैयार नहीं था। सामने लड़कियों का ग्रुप खड़ा था। सबके हाथ रंग – बिरंगी राखियों से लैस थे। उसे लग रहा था कि वह एक मेमना है जो अपने झुंड से बिछड़कर शेरनियों के इलाके में आ गया है। वह क्या करे – सोच ही रहा था कि एक – एक करते हुए छ: राखियाँ उसकी कलाइयों से बंध चुके थे। “आज के दिन कोई बिना राखी बंधवाए रहता है क्या?”-अमिता ने उसके हाथ पर आख़िरी राखी बांधते हुए कहा।

लुटा-पिटा प्रियांश उसके बाद हमारी मंडली का मानद् सदस्य बन चुका था। उसे अफ़सोस सिर्फ़ इस बात का था कि हमारी मंडली की पाठशाला अगर वह समय से ज्वाइन कर लेता तो जीवन की सबसे भयंकर दुर्घटना से बच जाता।



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