शनिवार, 11 नवंबर 2017

ये कैसी मज़बूरियों में मिले हैं हम
कि पास होकर भी दूरियों से घिरे हैं हम

हम जिनके प्यार में होते हैं,
कितने कम अक्सर हम उनके पास होते हैं।

ये भी है कि चाहे – अनचाहे हमें दूरियों में जीने की आदत हो जाती है। मज़बूरियों को गले लगाने की आदत हो जाती है।
सप्ताह के कार्यकारी दिनों में उससे घंटे भर की बात भी नहीं हो पाती। कभी उसका रूठना मिस हो जाता है, कभी मनाना, कभी हँसना – खिलखिलाना। देर शाम मेरे आते – आते अगर वह जगी रही तो दरवाज़े पर ही खड़ी होगी। ज़्यादातर दिनों में हद – से ज़्यादा ख़ुशी बिखेरती हुई, कभी, किसी दिन थोड़ी नाराज़गी दर्शाती हुई। दोनों ही परिस्थितियों में वह मेरी जान होती है। और जिस दिन सो गयी तो आकर उसके पास बैठ जाना ही बचता है बस । तब यूँ लगता है मानो ज़िन्दगी दिन भर उथल – पुथल मचा चुकने के बाद किसी शांत नदी के किनारे आ बैठी है।


आज की सुबह नींद आँखों में बहुत बची हुई थी जब उसने मुझे खींचकर जगा दिया। फिर नन्ही – नन्ही कोमल ऊँगलियाँ बालों में फिराती हुई बोली – “पार्क चलोगे!”
नींद खुल गयी।
मैंने अधखुली आँखों से देखने की कोशिश की। पर अधखुली आँखों से देखना, उसे अधूरा देखना होता है। मैंने पूरी आँखों से उसे देखा। उसकी आँखों में वात्सल्य पूरी धार से बह रहा था । मैंने कहा – “चलते हैं!”


बच्चों को ठहराव पसंद नहीं।  वे हमेशा बहते रहना चाहते हैं अपनी पूरी ऊर्जा से। दौड़ना – भागना। झूलना – उछलना और दिख गयीं तो फिर मछलियों की आँखों में देखते रहना। फ़ालतू के कामों के लिए उनके पास कोई समय नहीं होता। वे बड़ों के काम हैं । जैसे ओस से भरे आकाश में बड़े होते सूर्य को देखना। जैसे आबोहवा में रेशमी किरणों का पसरते जाना। जैसे बालों पर फिसलती रश्मियों को फ़ोटो में समेटने की कोशिश करना।
और वो क्रोधित हो जाती है –  “पापा मुझे परेशान ना करो, मुझे मछलियाँ देखनी है, गोल्डन कलर वाली, देखने दो न..”
उसे क्या पता कि समय की रफ़्तार उसे एक दिन झूलों, मछलियों और मस्तियों से निकालकर बड़ी कर देगी, मुझसे दूर खड़ी कर देगी। फिर यह सेल्फ़ी ही तो साथ रहेगी न सोना…!



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